जेसन से घंटों बात-चीत करने के बाद डॉक्टर ब्रोगार्ड ने बताया कि वो सायनेस्थेसिया का शिकार हैं. ये एक तरह की दिमाग़ी हालत होती है जब दिमाग़
की नसें गड्डमड्ड हो जाती हैं.
दिमाग़ किसी और ही दिशा में काम करने लगता है. दिमाग़ जिस चीज़ के बारे में सोचता हो वो या तो सिर्फ़ दिमाग़ में रहती हैं या फिर उसकी सोच के मुताबिक़ ही हरेक चीज़ नज़र आने लगती है.
डॉक्टर ब्रोगार्ड ने हेलसिंकी की आल्टो यूनिवर्सिटी की ब्रेन रिसर्च यूनिट में जैसन के कई ब्रेन स्कैन किए. उसी से पता चला कि जेसन के दिमाग़ के कुछ हिस्सों में समझने की ताक़त नहीं है. लेकिन, वो कुछ ख़ास तरह की तस्वीरें उकेर सकता है.
जेसन ने अपने तज़ुर्बे की बुनियाद पर एक किताब लिखी जिसका नाम है 'स्ट्रक बाय जीनियस'. उन्होंने दुनिया भर में जाकर लोगों को अपनी कहानी बताई और लोगों को गणित सिखाया.
2002 में 12 सितंबर की उस रात जिन दो लोगों ने जेसन पर हमला किया था, उन्हें कभी भी अपराधी नहीं ठहराया गया. हालांकि जेसन ने दोनों को पहचान लिया था. अलबत्ता इन हमलावरों में से एक ने उन्हें ख़त लिखकर माफ़ी मांगी.
जेसन कहते हैं आज उनकी ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई है. उस एक चोट ने उन्हें दुनिया में नज़र आने वाली हरेक चीज़ में ऐसी आकृतियां दिखानी शुरू कर दीं जो किसी और को नज़र नहीं आतीं.
मिसाल के लिए अगर बारिश की बूंदें गिरती हैं तो पेगेट को उन बूंदों में अनगिनत आकृतियां नज़र आती हैं जो एक दूसरे पर तारों की तरह या बर्फ की बूंदों की तरह लहराती हैं.
जेसन सोचते हैं जो कुछ वो देख पाते हैं काश उसे ज़माना भी देख पाता. उन्हें आज सितंबर की उस रात के हादसे का कोई अफ़सोस नहीं है. आज वो एक ख़ुशहाल ज़िंदगी जी रहे हैं.
हांगकांग के रिहाइशी इलाकों के घने टॉवरों का जंगल वहां रिहाईश के
साल 2002 में नौकरी छोड़ने तक उन्होंने यहां 8 साल तक काम किया. एक साल बाद उन्होंने टॉवर ब्लॉक की तस्वीरें लेनी शुरू कर दीं.
यही आगे चलकर 'आर्किटेक्चर ऑफ़ डेंसिटी' के रूप में सामने आया.
संकट का प्रतीक है. यहां लाखों परिवार छोटे छोटे घरों में रहते हैं.
लेकिन फ़ोटोग्राफ़र माइकल वुल्फ़ ने इन घनी बिल्डिंगों में भी सुंदरता के पहलू ढूंढ निकाले, बिना इस बात को नज़रअंदाज़ किए कि इसमें रहने वालों की ज़िंदगी वाकई कितनी कठिन है.
बीते 24 अप्रैल को 64 साल की उम्र में वुल्फ़ की हॉग कॉग में मौत हो गई.
11 साल तक चले प्रोजेक्ट आर्किटेक्टर ऑफ़ डेंसिटी के लिए उन्हें जाना जाता है. इसके उन्होंने यहां के रिहाईशी ब्लॉक की तस्वीरें लीं और उनकी इस तरह काट छांट की कि वो बेहद घनी दिखती हैं.
टॉवर ब्लॉक की ये तस्वीरें इतनी अमूर्त दिखती हैं कि किसी को भी इसकी वास्तविकता समझने में कुछ सेकेंड का वक़्त लग सकता है.
बहुत बारीक़ से नज़र डालने पर इसमें रहने वाले लोगों की ज़िंदगी के कुछ पहलू उभर कर सामने आते हैं. मसलन बालकनी में लटके तौलिए, अधखुली खिड़कियां या बाहर सूखने के लिए फैलाई गई टी शर्ट.
साल 3014 में वुल्फ़ ने बीबीसी को बताया था, "एक फ़ोटो पत्रकार के रूप में मुझे अपनी तस्वीरों में कंपोजिशन से परिचित था और दर्शक को तस्वीरों में बांध लेने का काम करना मुझे बेहद पसंद था. जबतक सिर पर आसमान है आप वहां देखते हैं और कुछ तस्वीरें ज़ेहन में रह जाती हैं."
"आर्किटेक्चर के साथ भी ऐसा ही है. अगर आसमान और क्षितिज सामने है तो आप इसके आकार प्रकार के बारे में लगभग अनुमान लगा लेते हैं और कोई भ्रम नहीं रहता. इन तस्वीरों को इस तरह काट छांट मैं केवल इमारतों को नहीं दिखा रहा होता हूं, बल्कि मैं एक रूपक बना रहा होता हूं."
लेकिन उनकी कुछ तस्वीरें ज़िंदगी से बिल्कुल क़रीब भी हैं. 'टोक्यो कंप्रेशन' में उन्होंने इस घनी आबादी वाले जापानी शहर की अंतरंग ज़िंदगी को दिखाया है, जिसमें लोगों के चेहरे ट्रेन की खिड़की से सटे दिखते हैं.
ट्रेन में इतनी भीड़ है कि निकलने का कोई रास्ता नहीं बचता और अधिकांश लोग अपनी आंख बंद कर लेते हैं या अपने चेहरे पर हाथ रख लेते हैं.
सिरीज़ 'माई फ़ेवराइट थिंग' जैसी अपनी कृतियों में सिटी लाइफ़ की बारीक़ चीजों पर वो फ़ोकस करते हैं.
दिमाग़ किसी और ही दिशा में काम करने लगता है. दिमाग़ जिस चीज़ के बारे में सोचता हो वो या तो सिर्फ़ दिमाग़ में रहती हैं या फिर उसकी सोच के मुताबिक़ ही हरेक चीज़ नज़र आने लगती है.
डॉक्टर ब्रोगार्ड ने हेलसिंकी की आल्टो यूनिवर्सिटी की ब्रेन रिसर्च यूनिट में जैसन के कई ब्रेन स्कैन किए. उसी से पता चला कि जेसन के दिमाग़ के कुछ हिस्सों में समझने की ताक़त नहीं है. लेकिन, वो कुछ ख़ास तरह की तस्वीरें उकेर सकता है.
जेसन ने अपने तज़ुर्बे की बुनियाद पर एक किताब लिखी जिसका नाम है 'स्ट्रक बाय जीनियस'. उन्होंने दुनिया भर में जाकर लोगों को अपनी कहानी बताई और लोगों को गणित सिखाया.
2002 में 12 सितंबर की उस रात जिन दो लोगों ने जेसन पर हमला किया था, उन्हें कभी भी अपराधी नहीं ठहराया गया. हालांकि जेसन ने दोनों को पहचान लिया था. अलबत्ता इन हमलावरों में से एक ने उन्हें ख़त लिखकर माफ़ी मांगी.
जेसन कहते हैं आज उनकी ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई है. उस एक चोट ने उन्हें दुनिया में नज़र आने वाली हरेक चीज़ में ऐसी आकृतियां दिखानी शुरू कर दीं जो किसी और को नज़र नहीं आतीं.
मिसाल के लिए अगर बारिश की बूंदें गिरती हैं तो पेगेट को उन बूंदों में अनगिनत आकृतियां नज़र आती हैं जो एक दूसरे पर तारों की तरह या बर्फ की बूंदों की तरह लहराती हैं.
जेसन सोचते हैं जो कुछ वो देख पाते हैं काश उसे ज़माना भी देख पाता. उन्हें आज सितंबर की उस रात के हादसे का कोई अफ़सोस नहीं है. आज वो एक ख़ुशहाल ज़िंदगी जी रहे हैं.
हांगकांग के रिहाइशी इलाकों के घने टॉवरों का जंगल वहां रिहाईश के
साल 2002 में नौकरी छोड़ने तक उन्होंने यहां 8 साल तक काम किया. एक साल बाद उन्होंने टॉवर ब्लॉक की तस्वीरें लेनी शुरू कर दीं.
यही आगे चलकर 'आर्किटेक्चर ऑफ़ डेंसिटी' के रूप में सामने आया.
संकट का प्रतीक है. यहां लाखों परिवार छोटे छोटे घरों में रहते हैं.
लेकिन फ़ोटोग्राफ़र माइकल वुल्फ़ ने इन घनी बिल्डिंगों में भी सुंदरता के पहलू ढूंढ निकाले, बिना इस बात को नज़रअंदाज़ किए कि इसमें रहने वालों की ज़िंदगी वाकई कितनी कठिन है.
बीते 24 अप्रैल को 64 साल की उम्र में वुल्फ़ की हॉग कॉग में मौत हो गई.
11 साल तक चले प्रोजेक्ट आर्किटेक्टर ऑफ़ डेंसिटी के लिए उन्हें जाना जाता है. इसके उन्होंने यहां के रिहाईशी ब्लॉक की तस्वीरें लीं और उनकी इस तरह काट छांट की कि वो बेहद घनी दिखती हैं.
टॉवर ब्लॉक की ये तस्वीरें इतनी अमूर्त दिखती हैं कि किसी को भी इसकी वास्तविकता समझने में कुछ सेकेंड का वक़्त लग सकता है.
बहुत बारीक़ से नज़र डालने पर इसमें रहने वाले लोगों की ज़िंदगी के कुछ पहलू उभर कर सामने आते हैं. मसलन बालकनी में लटके तौलिए, अधखुली खिड़कियां या बाहर सूखने के लिए फैलाई गई टी शर्ट.
साल 3014 में वुल्फ़ ने बीबीसी को बताया था, "एक फ़ोटो पत्रकार के रूप में मुझे अपनी तस्वीरों में कंपोजिशन से परिचित था और दर्शक को तस्वीरों में बांध लेने का काम करना मुझे बेहद पसंद था. जबतक सिर पर आसमान है आप वहां देखते हैं और कुछ तस्वीरें ज़ेहन में रह जाती हैं."
"आर्किटेक्चर के साथ भी ऐसा ही है. अगर आसमान और क्षितिज सामने है तो आप इसके आकार प्रकार के बारे में लगभग अनुमान लगा लेते हैं और कोई भ्रम नहीं रहता. इन तस्वीरों को इस तरह काट छांट मैं केवल इमारतों को नहीं दिखा रहा होता हूं, बल्कि मैं एक रूपक बना रहा होता हूं."
लेकिन उनकी कुछ तस्वीरें ज़िंदगी से बिल्कुल क़रीब भी हैं. 'टोक्यो कंप्रेशन' में उन्होंने इस घनी आबादी वाले जापानी शहर की अंतरंग ज़िंदगी को दिखाया है, जिसमें लोगों के चेहरे ट्रेन की खिड़की से सटे दिखते हैं.
ट्रेन में इतनी भीड़ है कि निकलने का कोई रास्ता नहीं बचता और अधिकांश लोग अपनी आंख बंद कर लेते हैं या अपने चेहरे पर हाथ रख लेते हैं.
सिरीज़ 'माई फ़ेवराइट थिंग' जैसी अपनी कृतियों में सिटी लाइफ़ की बारीक़ चीजों पर वो फ़ोकस करते हैं.